मुखपृष्ठ
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 78, फरवरी(प्रथम), 2020

आग नहीं हूं मैं

आलोक कौशिक

आग नहीं हूं मैं कुछ लोग फिर भी जलते हैं मुझको गिराने में वो हर बार फिसलते हैं उनसे भी मिला करो जिनकी ज़ुबां है कड़वी बचो उनसे जो कानों में ज़हर उगलते हैं देती है सुकून आख़िर मेरी ही मोहब्बत आज भी दिल जब हसीनाओं के मचलते हैं अश्कों का सैलाब उमड़ पड़ता है आंखों से जब दर्द देने वाले इस दिल में मिलते हैं इश्क़ इज्जत इबादत कुछ भी कर लो आशिक़ बदलने वाले फिर भी बदलते हैं

कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें