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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 78, फरवरी(प्रथम), 2020

चर्चा ये सरेआम हो गया

आलोक कौशिक

सारे शहर में चर्चा ये सरेआम हो गया दोस्ती से ऊपर हिंदू इस्लाम हो गया खड़ी कर दी मज़हब की दीवार तो सुन अब भगवान मेरा परशुराम हो गया गिरे हो तुम जबसे मेरी इन नज़रों में तेरी नज़रों में काफ़िर मेरा नाम हो गया कामयाबी मिल सकती थी तुझको लेकिन नापाक था साजिश तेरा जो नाकाम हो गया अजायबघरों में रखा ताज गर तेरा है समझ ले भयानक तेरा अंजाम हो गया लिखे शे'र मां पर तो तुझे मिली शोहरतें किया तौहीन औरतों की बदनाम हो गया दिखा नहीं जो कुछ दिनों तक अख़बारों में तूने समझा कि 'कौशिक' गुमनाम हो गया

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