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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 78, फरवरी(प्रथम), 2020

प्रकृति संरक्षण का पर्व: घुघुतिया

पवनेश ठकुराठी 'पवन'

घुघुतिया उत्तराखंड का लोकप्रिय पर्व है। इस दिन आटे, दूध गुड़ अथवा चीनी आदि के मिश्रण से घुघुत नामक खाद्य पदार्थ बनाकर कौवों को खिलाने की परंपरा वर्षों से चली आ रही है। घुघुतिया त्योहार के पहले दिन रात में घुघुत बनाये जाते हैं और दूसरे दिन प्रात: कौवों को खिलाये जाते हैं। बच्चे सुबह नहा-धोकर कौवों को पुकारते हैं-

काले कौव्वा, काले।
घुघुतीकि माला खा ले।


वस्तुत: घुघुति फाख्ता नामक पक्षी को कहते हैं। शास्त्रों के अनुसार ऐसी मान्यता है कि इस दिन सूर्य भगवान अपने पुत्र शनि से मिलने उनके घर जाते हैं। ज्योतिष की दृष्टि से शनिदेव को मकर राशि का स्वामी कहा जाता है, इसीलिये इस दिन को मकर संक्रांति के नाम से जाना जाता है। सर्वविदित है कि महाभारत की कथा के अनुसार भीष्म पितामह ने अपनी देह त्यागने के लिए मकर संक्रांति का ही दिन चुना था। केवल इतना ही नहीं इस दिन से सूर्य भगवान उत्तरायण की ओर प्रस्थान करते हैं और उत्तर दिशा में देवताओं का वास माना जाता है। यही कारण है कि इस दिन जप-तप, दान-स्नान, श्राद्ध-तर्पण आदि धार्मिक क्रियाकलापों को करना शुभ माना जाता है। मकर संक्रान्ति के दिन से ही माघ महीने की शुरूआत होती है। यह त्यौहार पूरे भारत में बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है लेकिन देश के अलग अलग हिस्सों में यह त्यौहार अलग-अलग नाम और तरीके से मनाया जाता है।इस त्यौहार को उत्तराखण्ड में “उत्तरायणी” के नाम से मनाया जाता है । कुमाऊं मंडल में यह घुघुतिया के नाम से भी मनाया जाता है तथा गढ़वाल में इसे खिचड़ी संक्रान्ति के नाम से जाना जाता है ।

कुमांऊ के गाँव-घरों में घुघुतिया त्यौहार से सम्बधित कई लोककथाएँ प्रचलित हैं। एक लोककथा के अनुसार कुमाऊं में चंद वंश के राजा कल्याणचंद हुआ करते थे। भगवान बागनाथ के आशीर्वाद से उनका कल्याणचंद नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। कल्याणचंद को प्यार से उसकी मां घुघुती कहकर बुलाती थी। इसी घुघुती नामक बच्चे की कौवों ने एक दुष्ट मंत्री से रक्षा की थी।उसी दिन ( मकर संक्रांति) से उसकी माता हर वर्ष पकवान बनाकर कौवों को खिलाने लगी । दूसरी प्रचलित लोककथा के अनुसार कुमाऊं के एक घुघुती नामक राजा ने अपने संकट और मृत्यु योग को टालने के लिए ज्योतिषी के आदेशानुसार कौवों को आटे के घुघुते बनाकर खिलाये, जिससे उसके ऊपर आये मौत का संकट टल गया। तभी से यह त्यौहार मनाया जाने लगा।

मकर संक्रान्ति या उत्तरायणी के इस अवसर पर उत्तराखंड में नदियों के किनारे मेले लगते हैं। इनमें दो प्रमुख मेले हैं। पहला बागेश्वर का उत्तरायणी मेला (कुमाँऊ क्षेत्र में) और उत्तरकाशी का माघ मेला (गढ़वाल क्षेत्र में)। बागेश्वर के उत्तरायणी मेले की शुरूआत चंद वंशीय राजाओं के शासनकाल से हुई। चंद राजाओं ने ही ऐतिहासिक बागनाथ मंदिर में पुजारी नियुक्त किये। बाद में धीरे-धीरे यह स्थान धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का प्रमुख केन्द्र बन गया। इतना ही नहीं यहाँ दूर-दराज से लोग व्यापार करने आने लगे। तिब्बती व्यापारी यहाँ ऊनी माल, चँवर, नमक व जानवरों की खालें लेकर आते। धारचूला के रंग और मुनस्यारी के भोटिया लोग गलीचे, दन, ऊनी कम्बल, जड़ी बूटियाँ लेकर आते। नेपाल के व्यापारी शिलाजीत, कस्तूरी, शेर व बाघ की खालें लेकर आते। स्थानीय व्यापारी भी अपने-अपने सामान यहां बेचने के लिए लाते थे। दानपुर की चटाइयाँ,नाकुरी के डाले-सूपे, ताँबे के बर्तन,काली कुमाऊँ के लोहे के भदेले, गढ़वाल और लोहाघाट के जूते आदि सामानों का तब यह प्रमुख बाजार था।

उत्तरकाशी के माघ मेले का शुभारंभ प्रतिवर्ष मकर संक्राति के दिन पाटा-संग्राली गांवों से कंडार देवता और अन्य देवी देवताओं की डोलियों के उत्तरकाशी पहुंचने से होता है। यह मेला 14 जनवरी (मकर संक्राति) से प्रारम्भ हो कर 21 जनवरी तक चलता है। इस मेले में पूरे भारत से धार्मिक प्रवृत्ति के लोग जहाँ भागीरथी नदी में स्नान हेतु आते हैं। इस मेले का भी धार्मिक, सांस्कृतिक और आर्थिक दृष्टि से अत्यधिक महत्व है। कुमाऊं का घुघुतिया पर्व मानव और प्रकृति को परस्पर जोड़ने वाला पर्व है। यह पर्व मनुष्य को प्रकृति के न सिर्फ करीब ले जाता है, बल्कि प्रकृति के संरक्षण और संवर्द्धन की भी प्रेरणा देता है। पर्व को मनाए जाने का कारण चाहे जो भी हो, किंतु यह पर्व वन्य जीव-जन्तुओं के साथ मनुष्य के संबंधों को उन्नत बनाता है और प्रकृति की सुरक्षा का संदेश देता है। पक्षियों को भोजन खिलाने की स्वस्थ और आदर्श परंपरा शायद ही किसी अन्य पर्व में मौजूद हो। इस दृष्टि से यह पर्व अंतरराष्ट्रीय महत्व का पर्व बन जाता है।


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