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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 78, फरवरी(प्रथम), 2020

प्रतियोगी परीक्षा: यथार्थ व चुनौतियाँ

अंकित भोई 'अद्वितीय'

विष्णु भगवान हैं और शिव भी भगवान हैं। दोनों भगवान हैं। कमल भी फूल है और धतूरा भी फूल है। ये दोनों फूल हैं। मेरा यहाँ पाठक वर्ग से एक छोटा-सा, विनम्र किन्तु व्यावहारिक और अत्यन्त महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या धतुरे का फूल भगवान विष्णु पर केवल यह सोचकर चढ़ाया जा सकता है कि आखिर यह भी तो फूल ही है? इसका उत्तर हमारे पूर्वजों ने अपने तरीके से इस मुहावरे के जरिए हमें दिया है कि ‘जैसी देवता वैसी पूजा।’ भगवान शिव को तो धतूरा चढ़ सकता है, लेकिन भगवान विष्णु को नहीं।

इसी बात को परीक्षा तथा प्रतियोगी परीक्षा पर लागू कर सकते हैं। हैं तोे ये दोनों ही परीक्षा, लेकिन इसके बावजूद दोनों एक नहीं हैं। यदि एक होते, तो दूसरे के आगे प्रतियोगी शब्द लगाने की जरूरत पड़ती ही नहीं। किसी भी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करें, परीक्षार्थी को उस परीक्षा के स्वरूप और चरित्र के बारे में अच्छी तरह समझ लेना चाहिए। यह ठीक उसी तरह है जैसे कि आप किसी नए स्थान पर जाने से पहले वहाँ के मौसम तथा अन्य बातों के बारे में पता कर लेते हैं, ताकि उसी के अनुसार अपनी तैयारी कर सकें। मौसम के अनुकूल कपड़े रख सकें। मई के मौसम में, भले ही वह गर्मी का मौसम ही क्यों न हो, यदि आप मसूरी जाने की योजना बनाते हैं, तो आपके हाथ में छाता होना ही चाहिए किन्तु इस कटु यथार्थ से कोई भी अनभिज्ञ नहीं है कि अधिकांश भारतीय छात्रों में ऐसी सजगता का सर्वथा अभाव है।

जैसा कि हम सभी जानते हैं भारत में तालीम अर्जित करने का उद्देश्य सिर्फ सरकारी नौकरी पाने तक सिमट कर रह गया है। वर्तमान संक्रमणकालीन परिप्रेक्ष्य में बढ़ती हुई अपेक्षाओं के बीच छात्र वर्ग असामंजस्य के भावनात्मक भंवरजाल में फंसा हुआ है और पग-पग पर अनिर्णय की स्थिति का सामना कर रहा है। एक ओर जहां अभिभावक वर्ग अपने अपेक्षाओं का पहाड़ छात्रों पर लादने में जुटा हुआ है तो दूसरी ओर छात्र स्वयं वृत्तिक बहुविकल्पता व दुर्बल आत्मानुसंधान शक्ति के कारण अपनी क्षमता का समुचित मूल्यांकन करने में पूर्णतः विफल सिद्ध हो रहे हैं। इतिहास गवाह है जब-जब अपेक्षाओं का पलड़ा रुचि पर भारी हुआ है तब तक प्रतिभा की मृत्यु हुई है। निराशाजनक तथ्य यह है कि सब कुछ जानते हुए भी देश का बुद्धिजीवी वर्ग तमाशबीन बना हुआ है।

हतप्रभ करने वाले आंकड़ों की बात करें तो परीक्षाओं के आयोजक अभिकरणों जैसे व्यापमं, लोक सेवा आयोग, कर्मचारी चयन आयोग आदि ने संबंधित परीक्षाओं की फीस इतनी ज्यादा बढ़ा दी है कि यदि सबको जोड़ा जाए तो कुल चयनित पदों पर दिया जाने वाला वेतन का प्रबन्ध आसानी से परीक्षार्थियों के फीस से ही किया जा सकता है। प्रतिस्पर्द्धा के अत्याधुनिक दौर में आज भी पुराने ढर्रे पर चल रही भारतीय शिक्षा प्रणाली विद्यार्थियों में समुचित प्रतिस्पर्द्धी योग्यता का विकास करने में विफल साबित हुई है, यही कारण है कि वैश्विक मंच पर भारतीय छात्र लगातार पिछड़ते जा रहे हैं।

ऐसा नहीं है कि शिक्षा व्यवस्था को लेकर देश में सुधारात्मक प्रयास नहीं हो रहे हैं। योजनाएं तो बन रही हैं किंतु केवल कागजों तक सिमटा हुआ रह जाने के कारण वह जमीनी स्तर पर क्रियान्वित नहीं हो पा रही हैं। अव्यवस्था का आलम यह है कि नौकरशाही और तानाशाही में फर्क करना कठिन हो गया है। प्रशासक वर्ग का यह दायित्व बनता है कि वह स्वयं जिन समस्याओं का सामना करते हुए संबंधित ओहदे तक पहुंचे हैं उस पर गहन मंथन करें व व्यवहारिक सुधारात्मक परिणाम दें। बहरहाल आवश्यकता है कि स्थिति बिगड़ने से पहले उसे सुधारा जाए अन्यथा भविष्य में नस्लें अपने पूर्वजों को कोसती रह जाएंगे और पछताने के अलावा हमारे पास कोई भी विकल्प शेष नहीं बचेगा।


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