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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 78, फरवरी(प्रथम), 2020

दर्द

वर्षा वार्ष्णेय

दर्द ही दर्द पाया है जिंदगी में अथाह क्या कोई बाँट पाया इसे आधा आधा । शर्तों पर काटी नहीं जाती जिंदगी क्यों हिकारत से बँधी है हर खुशी होल्ड पर लगी हो कोई कॉल जैसे मशविरा भी है सबका अपना जैसा । वक़्त की कमी या दिल का भर जाना जिंदगी है सिर्फ हर वक्त परिवर्तन चाहना दंश सर्प का ही नहीं मौत के उलाहना , बिना प्रेम के जीवन है सिर्फ एक अफसाना जिद जीने की या खौफ से मर जाना तराजू है जिंदगी का न्याय का फसाना'

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