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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 78, फरवरी(प्रथम), 2020

इतना मत सोचो.....

सुरेन्द्र सैनी बुवानीवाल

आज क्या हुआ तुम्हें जो शाम की सी उदासी तेरे उजले से चेहरे पर है. क्या सोच रहे हो? जिंदगी तो आसान नहीं ढूंढ लो कोई हमसफ़र जिसे तुम अपना कह सको. ये राहें ग़मगीन रही हैं इनपर ख़ामोशी बहुत है लेकिन तुम्हारा हौंसला हर पल हिम्मत देगा. खुद को दुनियादारी में ढ़ालो अपना कोई साथी बना लो. ये सन्नाटे तेरे दुश्मन है, अपने ज़ज्बातों को आवाज़ बना लो. उदासी को भूल जाओ "उड़ता " अपनी लेखनी को एहसास बना लो.


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