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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 78, फरवरी(प्रथम), 2020

जाति अभिशाप

सुरेन्द्र सैनी बुवानीवाल

ये कैसे नेता हुए, कैसी ये ख्याति, इंसानियत ख़त्म हुई, रह गयी जाति. बेज़ार कर दिया समाज को, कहीं शर्म नज़र नहीं आती. गुलाब का फूल अलग कर दिया, काट कर रख दी पाती. आरक्षण का आधार बनाया, ये जाति -व्यवस्था हमें सताती. समान अवसर सभी को चाहिए, क्यों ये बात समझ नहीं आती. शिक्षा का अधिकार खा गयी, जाति इसे व्यापार बनाती. राजनीति की बिसात हुई है "उड़ता ", बस वोट बैंक बन गयी है जाति.

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