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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 78, फरवरी(प्रथम), 2020

जरूरी ही था

शुचि भवि

क्या हुआ गर तुमने देखा सिर्फ़ अपनी ही नज़र से देखा तो था,,,, क्या हुआ गर तुमने सोचा अपने ही नज़रिए से सोचा तो था,,,, क्या हुआ गर भूले तुम अपने सारे किये वादे किये तो थे,,,, क्या हुआ गर हुए हम अब यूँ जुदा सदा सदा मिले तो थे,,,, वादा था जरूरी मिलना था जरूरी सोचना था जरूरी देखना था जरूरी बेहद जरूरी कि सच तब ही तो होता न उजागर,,,,


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