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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 78, फरवरी(प्रथम), 2020

इंतज़ार

शबनम शर्मा

नहीं लिखनी है मुझे कविता, नहीं बाँधना है मुझे किसी भी जज़्बात को शब्दों के जाल में, नहीं दुखाने हैं मुझे इन नादान अक्षरों के दिल, अब बहुत हो चुका, थक गई हूँ मैं, पथरा गई हैं मेरी आँखें, मुझे सिर्फ करना है अब, तुम्हारा इन्तज़ार, ज़िन्दगी की नाव में, यादों की पतवारों के साथ, उस जल पर जो तुम्हें प्रिय, जिसकी लहरों में है वो उतार-चढ़ाव जो तुमने दिये, जिन पर चढ़ना अच्छा लगा, और उतरने पर विछोह, ले जाये वह हमें उस किनारे, जहाँ पर तुम्हें इंतज़ार हो नाव का, उस पार जाने के लिए। जो सुगंध तुमने बिखराई उसे समेटे बैठा कोई, ऐसी दी सौगात किसी को प्राण बनाए बैठा कोई, पायल का घुंघरू बन बैठा, आँखों का काजल बन बैठा, बिंदिया का कुमकुम बन बैठा, ऐसा ही बन बैठा कोई, छूट गया दुपट्टा कहीं, उसे सम्हाले बैठा कोई ख्वाब सजाये बैठा कोई आस लगाये बैठा कोई, चंदन मन में आग लगी है आँखों में बरसात लगी है इंतज़ार तेरे आने का हाथ पसारे बैठा कोई, खामोशी में डूब गई है राह निहारे बैठा कोई, तेरे नयनों का कायल है ज्योति जगाये बैठा कोई


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