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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 78, फरवरी(प्रथम), 2020

मिलकर के खिलवाड़ किया है

राजू पाण्डेय

थे हरे भरे वृक्षधरा पर चहुँ ओर हरियाली थी ठंडे ठंडे पानी के संग फ्री हवा मतवाली थी। पेड़ों के जंगल बदले कंक्रीट के बागों से जानवर जू में आ गये अपने अशियानों से। फिल्टर पानी बिकने लगा लीटर के भावों से बोतलें भर गयी अब बहती हुई हवाओं से। मिलकर के खिलवाड़ किया हैं पानी और हवाओं से थोड़ी थोड़ी खिसक रही हैं "राजू" जिंदगी दवाओं से।


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