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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 78, फरवरी(प्रथम), 2020

फिर से जिन्दगी को गले लगा के देख

प्रीती श्रीवास्तव

फिर से जिन्दगी को गले लगा के देख। चाहतों के रूबरू सर झुका के देख।। दूर हो जाऊंगी मैं आहिस्ता आहिस्ता। अपनी तहरीर में ही आजमा के देख।। वो कशिश नही रही अब लकीरों में। जरा पढ़ उन्हें, लोगो को पढ़ा के देख।। चली जाऊंगी यूं हंसते मुस्कुराते हुये। अभी कुछ दिन और मुझे भुला के देख।। अब वो नशा नही रहा मयकशी का। शराब बरसों पुरानी तू उठा के देख।। खो चुकी हूं कहीं दुनिया की भीड़ में। अपने तसब्बुर में फिर बुला के देख।। रोज आती है कयामत मिलने मुझसे। दिल से दिल को रूबरू करा के देख।। आशिक के मिसरे पर लिखें अशआर। आशिकों की तहरीर से मिला के देख।।

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