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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 78, फरवरी(प्रथम), 2020

तीन कविताएँ

पवनेश ठकुराठी 'पवन'

1. सच लिखने के जुर्म के बदले उसे अंदाजा नहीं था इश्क बाजार में इतने महंगे दाम में मिलेगा। उसने कभी सोचा नहीं था सच लिखने के जुर्म के बदले उसे कफन इनाम में मिलेगा।। 2. सरिता सरिता बहती ज्ञान की, तुम लगाओ गोता। अवसर जाये हाथ से, तब रहेगा रोता।। तब रहेगा रोता, बन जायेगा अज्ञानी। गायेगा दुखभरी, अपनी असफल कहानी।। कहै पवन कविराय, ज्ञान बिन जीवन रीता। लगाओ झट डुबकी, बहती ज्ञान की सरिता।। 3. बजे प्रेम की बांसुरी पर्व मानव के प्राण, हैं सभ्यता की ये धुरी। मनायें इन्हें आज, छोड़ आदतें सब बुरी। मन की यह आवाज, कुटुंब धरा पर सबको। मिले मोक्ष का धाम, बजे प्रेम की बांसुरी।।

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