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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 78, फरवरी(प्रथम), 2020

मैं शान से खड़ा रहा

मनन तिवारी

तूफ़ान आया मैं शान से खड़ा रहा, माँ की दुआ थी कि मै अड़ा रहा। उजड़ गई तमाम बस्तियां, मगर मेरा छप्पर फिर भी खड़ा रहा। अँधेरा सा छाया था घर मे फ़िर भी, माँ की आँखो से रौशन मेरा हुजरा बड़ा रहा। जब मुफ़लिसी से टूट रहा था मैं, माँ ने मुट्ठी खोली मैं हीरे मोती जड़ा रहा। है अगर असर कहीं उसकी अहल ए खुदाई का, मनन वो माँ के हाथों मे बड़ा रहा।

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