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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 78, फरवरी(प्रथम), 2020

सेल्फी

महेन्द्र देवांगन माटी

जिधर देखो उधर, सेल्फी ले रहे हैं । ओरिजनल का जमाना गया, बनावटी मुस्कान दे रहे हैं । भीड़ में भी आदमी आज अकेला है तभी तो बनावटी मुस्कान देता है । और जहाँ भीड़ दिखे वहाँ खुद मुस्करा कर सेल्फी लेता है । भीड़ में दिख गया कोई अच्छी सी लड़की तो आदमी पास चला जाता है । चुपके से सेल्फी लेकर अपने दोस्तों को दिखाता है । दिख गया कहीं जुलूस तो लोग आगे आ जाते हैं । और एक सेल्फी लेकर पता नही कहां गायब हो जाते हैं । खाते पीते उठते बैठते लोग सेल्फी ले रहे हैं । मैं समाज के अंदर हूँ ये बतलाने फेसबुक और वाटसप पर भेज रहे हैं । सच तो ये है आदमी कितना अकेला हो गया है । एक फोटो खींचने वाला भी नहीं मिल रहा इसीलिए तो सेल्फी ले रहा है ।


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