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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 78, फरवरी(प्रथम), 2020

बंधन

कुन्दन कुमार

पग सने दो धूल से थे केश धवल बिखरे हुए मैं आ रहा था लौट कर प्रेयसी चिता अग्नि दिए वक़्त जिनके साथ गुजरे अनांदमयी जीवन लिए थामती थी हर घड़ी कस्ती यदि विचलित हुए सब था मिला जो भी मेरा ये कर्म का ही दान था जो किया उसने सतत बलिदान सब मेरे लिए प्रेम का प्रतिफल मिला, सुत दिए सौभाग्यवश हर्ष में तुम डूबती, मुख चूमती देती सुयश मैं भी ख़ुशी में झूमता, था कर्मरत उसके लिए चाहतें सब भूलकर, रहा घूमता धन के लिए तुम भी दफ़न इच्छा किये श्रृंगार सारी भूलकर चैन एक-पल न लिया देती रही सब मातृवत तुम ही कहो आनंद का जीवंत पल वो भूलती लक्ष्य पाने का वो पत्र जो हर घड़ी तुम चूमती थी झूमती कहती सदा हर कर्ण को थका दिया न तुम थकी कहते हुए सुपुत्र का उल्लास था गर्व से फुला हुआ था वक्ष ले मैं घूमता पुत्र मेरा है पा लिया जो स्वप्न कभी मैं देखता माह बने थे वर्ष अब, फिर बदल गए कई साल में गंभीर तुम होती गई, घुलती रही यही आश में पुत्र पे विश्वास था भले पत्र अब लिखता नहीं मां को कोई क्या भूलता चाहे रहे जग में कहीं मैं तो पिता मेरा मान क्या अभिमान जब रहा नहीं उम्मीद ही अब छोड़ दो, क्यों रोती अकेली रात में पगली मुझको है समझाती, मुस्काती आ के पास मेरे मुर्झायी सी जो खुद रहती, चेहरे के जिसके रंग उड़े ब्यथा मेरे मन के भीतर उठता निश्चय ही है पल-पल शोक नहीं जो चला गया रोता मैं प्रिये की हालत पर वो थाम हथेली को मेरे नवश्वास निरंतर भरती है अभिनय करती उत्साहित सी दुःख-पीड़ा निज सब पीती है ये दिवस आज अंधियारों का मुक्ति देने को आई है रोती रहती हर-पल जो तुम संताप मिटाने आई है तुम जाओ प्रिये हर्षित होकर चिंता न करो मैं जी लूंगा पर आंसू तेरे जो हैं बहते मैं उसे नहीं पी पाऊंगा मुस्कान अधर पर बिखरे थे ख़ामोश मुझे वो देख रही बेसुध सा ही था बैठा मैं असमंजस भी थी दौड़ रही एक बूंद नहीं अश्रु मेरे पलकों को भी छू है सकी मैं भले अकेला हूँ बैठा सुत बंधन को वो तोड़ चली अनुरक्ति भाव जिसके खातिर मन लिए प्राण वो त्याग दिया वो ब्यस्त भला किस काम में था मुख अग्नि भी तो दे न सका मति मेरी ऐसी हुयी आज कुछ सोच नहीं पाता अब मैं जो करती थी रौशन राहें हूं लिए दीप ढूढूं जग मैं

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