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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 78, फरवरी(प्रथम), 2020

यूँ ही अचानक कहीं कुछ नहीं घटता

कविता रावत

यूँ ही अचानक कहीं कुछ नहीं घटता अन्दर ही अन्दर कुछ रहा है रिसता किसे फुरसत कि देखे फ़ुरसत से जरा कहाँ उथला कहाँ राज है बहुत गहरा बेवजह गिरगिट भी नहीं रंग बदलता यूँ ही अचानक कहीं कुछ नहीं घटता यूँ कहने को सारा जग अपना होता पर वक्त पर कौन है जो साथ रोता तेरे-मेरे के घेरे से कौन बाहर निकले जो सगा है वही कितना संग चलता यूँ ही अचानक कहीं कुछ नहीं घटता यूँ ही कोई किसी की सुध नहीं लेता बिन मांगे कोई किसी को कब देता जब तक विप्र सुदामा नहीं गए मांगने सर्वज्ञ कृष्ण भी कब गए उनके आंगने महलों का सुख, झोपड़ी को है जलाता यूँ ही अचानक कहीं कुछ नहीं घटता कल तक खूब बनी पर अब है ठनी बात बढती है तो तकरार ही है तनी तू-तू-मैं-मैं की अगर जंग छिड गयी तो अपने-पराए की भावना मर गयी सागर में यूं ही कब ज्वार-भाटा चढ़ता यूँ ही अचानक कहीं कुछ नहीं घटता जब साथ मिला तो खूब कमा लिया लक्ष्य दृढ़ रहे तो मुकाम भी पा लिया जो कल तक दूर थे, वे पास आने लगे कांटे बिछाते थे कभी, फूल बरसाने लगे बिन बादल आसमां भी कहाँ है बरसता यूँ ही अचानक कहीं कुछ भी नहीं घटता

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