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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 78, फरवरी(प्रथम), 2020

आराध्या(स्त्री या वन्द्या?)

ज्योति स्वामी “रोशनी”

क्यूँ प्रभात नहीं , संध्या हूँ मैं ? बस स्त्री हूँ या वन्द्या हूँ मैं ? नहीं! भोग्या नहीं, पूज्या हूँ मैं देवी हूँ , आराध्या हूँ मैं। सम्मान की मुझको चाह नहीं, स्व-मान मेरा स्वभाव है। अपमान की मैंने राह ना ली, अभिमान का बस प्रतिकार है। दृष्टि गर तेरी है अशुद्ध, पर्दा क्यूँ मेरी आंखो पर ? तेरे भाव मलिन, तुझे लाज नहीं! घूँघट मेरे सर- आंखो पर! फिर भी जब मन्दिर मे रोता, कर क्षमा, हित साध्या हूँ मैं । देवी हूँ, आराध्या हूँ मैं । है पूजा मेरी जिस घर मे, मैं वहीं तो मारी जाती हूँ । और दूजा वो कि जिस वर से, मैं बाँधी-ब्याही जाती हूँ । तब भी जीने पर पाबंदी , अब भी घुट-घुटकर जीना है। रेशम की जंजीरों मे बंध, रस्मो का आँसू पीना है। फिर भी सबका हित चाहने वाली, ये कैसी “ भाग्या” हूँ मैं ? देवी हूँ , आराध्या हूँ मैं? क्यूँ मेरी प्रतिभा पर संशय? क्यूँ जन्म पे बजती थाली नहीं? क्यूँ स्त्री गोरी ही चाहिए? क्यूँ पसंद कभी काली नहीं? क्यूँ मेरे नाम ही “रूक”, “बसकर”? शत पुरुषों पर भी वो नाम नहीं! क्यूँ मैं तलाक़ की जिम्मेदार? क्यूँ पुरुषों पर इल्जाम नहीं? वो भी महान यदि कर्म कहे, कर्मो से ही वन्द्या हूँ मैं । भोग्या नहीं, पूज्या हूँ मैं । देवी हूँ, आराध्या हूँ मैं। क्यूँ प्रभात नहीं , संध्या हूँ मैं ? बस स्त्री हूँ या वन्द्या हूँ मैं ?


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