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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 78, फरवरी(प्रथम), 2020

सुकून

धर्मेंद्र सिंह 'धर्मा'

मिलता है सुकून तेरी बांहों में, जब भी तुम करीब होती हो मेरे। सारी आशाएं ख़त्म हो जाती हैं तेरे होने से, जब भी खेलता हूँ तेरी जुल्फों से.... दर्द भी कराहता है अपने आप में, मुझ पर इसका असर जो नहीं होता। कभी हँसता था जो मेरे खस्ता हालतों पर, आज वही मेरी तरफदारी में लगा है.... ये तो वक़्त वक़्त की बात है, जो कल तेरा था और मेरा आज है। जब से तू है आयी मेरी जिन्दगी में बहार बनके, सुकून ही सुकून है जाने ये कैसा राज है....


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