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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 78, फरवरी(प्रथम), 2020

सवाल

धर्मेंद्र सिंह 'धर्मा'

कभी गुलज़ार में खिले, उन फ़ूलों को देखता हूँ। तो उनकी महक महसूस होती है, जाने कितने ही सवाल उठते हैं, मन में मेरे... और फिर खो जाता हूँ, यूँ ही....तन्हाइयों में, जिनके होने और ना होने से, कोई फर्क नहीं पड़ता। जिंदगी कुछ ऐसे, मोड़ पर आ खड़ी है, जहाँ से वापस लौटना, अब नामुमकिन सा है मेरे लिये.... दिल घबराता है कुछ इस क़दर, मानो किसी पिंजरे में कैद हो गयी हो, मेरी रूह.....जिससे आज़ाद होना, नामुमकिन सा हो मेरे लिये.... सोचता रहता हूँ, उन बुलन्दियों के बारे में। जिनकी शाखाओं तक, मेरा पँहुच पाना अभी मुश्किल सा है। रात के अँधेरे में, चमकते तारों से कुछ पूछता हूँ। क्या? सच में जलना पड़ता है..... आसमान छूने की ख़ातिर।


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