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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 78, फरवरी(प्रथम), 2020

मुमकिन ही नहीं

धर्मेंद्र सिंह 'धर्मा'

दिल के हर ज़र्रे में बसा है वो नाम..... जिसके होने से हर अंधेरा, गुम हो जाता था। उसकी मासूमियत में छुपे जाने कितने राज? कितने किस्से? कितनी यादें? और ना जाने कितने सपने? जिनको बुनते अर्से बीत गये..... बयां नहीं होते वो अल्फाज़ जो कहे थे एक दूजे से उन गलियों में, जिन्हें अब बदनाम कहते हैं। खुद से भी खफ़ा हूँ मैं लेकिन तेरी कोई खबर नहीं है मुझे..... अफीम के नशे की तरह था मेरा इश्क़..... मेरा जुनून.....जाने कैसे टूट गया? लेकिन.... वो वक़्त अब नहीं रहा, जिसे दोबारा से जी सकूँ..... उस नाम को फिर से पुकार सकूँ। सर अपना तेरे कांधे पर रख कर, इक दफ़ा फिर मुस्कुरा सकूँ...... दीये की तरह रातों में, जलता रहता हूँ.... ढूंढता हूँ कुछ टूटे हुये ख्वाबों को, जो मुमकिन ही नहीं... फिर क्यूँ दीवानों की तरह, आज भी तेरा इन्तज़ार रहता है जो मुमकिन ही नहीं....


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