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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 78, फरवरी(प्रथम), 2020

बेटी भी माँ भी

चंद्र मोहन किस्कू

घर में कुछ भी नहीं था चूहे कूद रहे थे भूख से और चूल्हा तो किसी राक्षस की तरह मुँह फाड़े बैठा था . घर में केवल था बेटी की गुल्लक जो बहुत हिफाजत के साथ रखी हुई थी . उसी के पैसे से वह खिलौना खरीदती लाल फीते से सजाती अपनी बाल. सुबह-शाम वह हिलाती थी गुल्लक ख़ुशी से चूमती थी . सभी की नज़रों से दूर छुपाकर रखती थी . जब घर पर चूल्हा जला नहीं खाना पकाने के लिए पानी गर्म हुआ नहीं गरीबी नामक काला अँधेरा जब फैलने लगा चरों ओर तब बेटी मेरी खिलौना भूल गई लाल फीते से सजना भी भूल गई याद किया केवल सफ़ेद फूलों जैसा भात और परिवार के लोगों की शेर जैसी भूख वह जानती है खिलौना से भी खाना और प्राण बड़ा होता है इसीलिए तो वह मेरी बेटी भी है और माँ भी


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