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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 78, फरवरी(प्रथम), 2020

मोमबत्ती

डॉ भावना पटेल

मैं मोमबत्ती सी, जलती, पिघलती रही हमेशा, और भरती रही पूरे घर में उजाला लड़ती रही ताउम्र तूफान के कुंठित कामनाओं से जब भी आता मिटा देने कि हवस में आता मेरे अपने अस्तित्व को जलती रही फिर भी हमेशा दूसरों के लिए जलते जलते खुद को संभालना ही भूल गई जल गया जीवन रूपी धागा बचा रहा तो बस! थोड़ा सा अवशिष्ट जो चिपका रहा अपने जलने की जगह पर जिस पर गुजरती रही तमाम उपेक्षा से परिपूर्ण नजरें फिर कभी न जल सकी, न खड़ी हुई मैं मिट गई, लूट गई, बुझ गई हमेशा के लिए हो गई विस्मृत....!

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