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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 78, फरवरी(प्रथम), 2020

बढ़ता कदम

बीना वीर

पहला कदम दूसरा कदम तीसरा कदम बढ़ती जाती हूँ समंदर में... वो मिटा देता है अपनी मौजों से मेरे पैरों के निशाँ और अपनी जीत की खुशी मनाते जोर-शोर से उछलता रहता है। मगर मैं विचलित हुए बिना निश्चिन्त हूँ जानती हूँ वो मेरे जुनून को मेरे जज़्बात को मेरे अरमान को कभी नहीं मिटा सकता हर कदम मैं आगे ही आगे बढ़ती ही जाती हूँ गहरे समंदर में...

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