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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 78, फरवरी(प्रथम), 2020

हम कवि हैं

अरुण कुमार प्रसाद

हम कवि हैं हम व्यक्ति,समाज,देश,विश्व व ब्रह्मांड की हर पीड़ा को शब्दों में रोते हैं कराते हैं अक्षरों और स्वरों में प्रतिध्वनित । समाज के मानस में हमारी प्रतिष्ठा शायद छद्म है और व्यवहार में व्यापक अवहेलना का भाव मुखर। हम भावनाओं,भाव और हर दर्द के व्याख्याओं में होते हैं उदात्त ऐश्वर्यशाली । भौतिक रूप से जीते हैं जिंदगी बदहालवाली। तन पर चीथड़े से वस्त्रों को रखे क्षुधावत उदर को भरोसे में लेते सृष्टि के हर दर्द को रोते हैं। हास्य,व्यंग्य की कृतियों में आलोचनाओं में भी दर्द सूक्ष्म-असूक्ष्म रूप में होता है समाहित संत्रास का अश्रुसिक्त राग। जिसे हम अपनी अंतरात्मा के तंतु से बोते हैं। लोग अनदेखा कर जाते हैं किन्तु, हम इससे नहीं सकते हैं भाग। भोगे और देखे यथार्थ को शब्द-रचनाओं में जीते हैं। हर व्यथाओं को पुन:-पुन: पीते हैं। हम कवि हैं,हमारी नियति निरीह है। समाज को लेकिन, हम ही देते आये मसीह हैं।


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