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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 78, फरवरी(प्रथम), 2020

उच्चतम बलिदान

अपूर्वा कुशवाहा ।

स्वर्णिम पलों की चाह मुझे, खींच यहां तक लाई है। कीमती प्राणों की हे नाथ ! ना कोई भरपाई है ।। कांटो भरी राह चुनते हैं जहां, न दूध है ना मलाई है । जंगली घास का लेना पड़ता है आहार; संग पड़ोसी की चतुराई है ।। मस्तक कटवाना मात्र मकसद नहीं; जो यह समझते, उन्हें दुहाई है! यह बात मौकापरस्तों को, कितने वर्षों से समझाई है !! उच्चतम शिखर पर पहुंचाकर, समक्ष मौत भी रोई है। आपका होता है भाग्य प्रबल; जो, जान महबूब* की गोद में सोई है।। घर में चूल्हा रोज जलातीं, राह ताकती तेरी माई है। अश्रुपूर्ण राखी - सिंदूर; सरहद पर ना पति, ना तेरा भाई है!! सरहद पर पैर जमाने में, रक्त - स्वेद की लागत आई है। न जाने कबसे तत्पर नालों** ने, कुछ पल को ली अंगड़ाई है।। अब वे हैं वो जगमग तारे, यही मीठी सच्चाई है। उद्दीप्त हो चुके हैं जो सारे, लड़कर आखिरी लड़ाई है।। हे प्रवर्तक परिवर्तन के ! बदल डालो इनके जीवन की रीत। हे महारक्षक जीवन के (प्रभु); इनके नामों में ना लगे शहीद !! इन के प्राणों की परवाह मुझे, खीझ से भर लाई है। चहुँ ओर वहां है भंवर मौत का; कितनी दफा समझ में आई है ?? *महबूब = भारत मां की गोद **नालों = बंदूकों

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