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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 78, फरवरी(प्रथम), 2020

तन का छलावा

अनिल कुमार

जल गयी कईं लाशें शमशान के मचान पर तजुरबे उनके भी वही थे बन्द मुट्ठी से पनपे खाली हथेली से जले थे जिसे संभाला था ताउम्र वह भी राख बने थे ख़याल था हर लम्हा कल का कल की फिक्र में पले थे अब न कल है ना फिक्र का लम्हा जला जो तन था वह भी कभी नहीं था अपना..।


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