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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 78, फरवरी(प्रथम), 2020

पतंग

अनिल कुमार

आज अचानक आसमान में उड़ती रंग-बिरंगी पतंगों में बचपन के रंग उबर आये नीले गगन में लगा जैसे पिंजरे में कैद पंछी आजाद हो गया फिर से असीमित आकाश को नापने कईं सपने लिये हाथ में डोर थामे शोर मचाते छतों के आँगन से आसमान को छूते सपनों के पतंग मानो हाथ हिलाकर बचपन के रंगों को फिर से सतरंगा कर देने को पतंगों के पंछी बन लौट आये बचपन की याद दिलाने।


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