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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 78, फरवरी(प्रथम), 2020

मन की बुझती नहीं पिपासा"

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

कल-कल करती व्यास-विपाशा। मन की बुझती नहीं पिपासा।। -- प्यास कहो या आस कहो तुम, तृष्णा-इच्छा, लोभ निराशा, पल-पल राग सुनाता मौसम, जीवन में उगती अभिलाषा। -- तन की तृषा भले बुझ जाये, लेकिन मन रहता है प्यासा, कभी अमावस कभी चाँदनी, दोनों करते खेल-तमासा। मन की बुझती नहीं पिपासा।। -- पूजा करके, इष्ट देव को, भोग लगाते लोग बतासा, पाठन-पठन, मनन करने का, सन्देशा देता चौमासा। मन की बुझती नहीं पिपासा।। -- देश-काल अनुसार जगत में, अलग-अलग होती परिभाषा, संकट आने पर देते हैं, सब सम्भाषण और दिलासा। मन की बुझती नहीं पिपासा।। -- वतन-परस्ती हुई नदारत, बदल गई है बोली-भाषा, लोकतन्त्र अभिशाप बन गयी रोग लगा है अच्छा-खासा। मन की बुझती नहीं पिपासा।।

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