मुखपृष्ठ
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 78, फरवरी(प्रथम), 2020

नीरव मन

डा. दिवाकर दत्त त्रिपाठी

शीतनिशा जैसा नीरव मन । ठिठुर रहा है मन का उपवन। कठिन प्रश्न हैं,कठिन व्याकरण। पीड़ा का हिय मध्य अवतरण । नही दिख रहे समाधान पथ, मन पे कुहरा सरिस आवरण। जला रही है मुझको पीड़ा , सुलग रहा मैं ,जैसे कुंदन । शीतनिशा.................. करवट करवट बीती रैना । शीतबिंदु से बरसे नैना । ठंडी हवा चुभे , तन को, ज्यों उर को चुभते तीखे बैना । यादों के हिमपात हो रहे , सूख रहा नैनों का मधुवन। शीतनिशा जैसा............ । बिन सूरज प्रभात सा जीवन। शीत धूप जैसा दुर्बल मन । धुंध भरे नभ सरिस कल्पना, न मयंक न कोई उडगन । सभी चर अचर शिथिल हो रहे, शिथिल पड़ रहा उर स्पंदन । शीतनिशा..................

कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें