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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 78, फरवरी(प्रथम), 2020

वो आये नहीं

डा. दिवाकर दत्त त्रिपाठी

हृदय व्याकुल, नैन में घन घोर,वो आये नहीं। कोशिशें मैंने करी पुरजोर,वो आये नहीं । कोयलों ठहरों ,सुनो, मत गीत गाओ! मधुकरों कलियों पें तुम मत गुनगुनाओं! हो रहा है कर्णभेदी शोर, वो आये नहीं। कोशिशें ......................... भीड़ में दिन कट गया फिर, रात तनहा आ गई। अंधेरे की एक चादर ,मेरे मन पे छा गई । कल्पनाएँ हो गई कमजोर,वो आये नही । कोशिशें..................... गिन के तारे रात काटी ,चाँद बूढ़ा हो गया। ओड़कर ऊषा की चादर,तिमिर देखो सो गया। आ गया किरणों को लेके भोर, वो आये नहीं। कोशिशें.................................. आ गया पतझार बूढ़ा,पात पीले हो गये । हो चुके बेरंग उपवन, देख मधुकर रो गये । टूटती साँसो की हर दिन डोर,वो आये नहीं । कोशिशें ...............

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