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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 78, फरवरी(प्रथम), 2020

टौमी और बंदर

नीरजा द्विवेदी

बच्चों आज तुम्हें टौमी और बंदरों की मनोरंजक कहानी सुनाना चाहती हूँ पर सोचती हूँ कि पहले टौमी का परिचय दूँ या बंदरों का. चलो दातागंज के नटखट बंदरों का ही परिचय पहले कराती हूँ. वैसे तो बंदर हर स्थान के लोगों को परेशान करते हैं परंतु दातागंज के बंदरों की खासियत यह है कि वे नटखट होने के साथ ही बुद्धिमान भी बहुत हैं. टंकी में लगे नल को खोलकर पानी पी लेना, दरवाज़ा खुला मिल जाये तो फ्रिज से फल, सब्ज़ी आदि लेकर भाग जाना, रोटी पाने के लिये सूखने डाले गये कपड़ों में से सबसे अच्छे कपड़े लेकर छत पर भाग जाना और प्रतीक्षा करना कि कोई आये और रोटी दे. रोटी न देने पर उसे दिखा-दिखा कर कपड़े के चिथड़े-चिथड़े करना आदि तो साधारण बातें हैं. उनकी शैतानी और चपलता असाधारण हैं.

बहुत पहले की घटना है उस समय दातागंज में बरातघर नहीं होते थे और बरातें बागों में रोकी जाती थीं. दावत में हिस्सा बटाने के लिये बंदर भी वहाँ अपनी टोली लेकर पहुँच जाते थे. उन दिनों बरातें तीन दिन रुकती थीं और पंडित, नाई के अतिरिक्त मालिश वाले, पालिश वाले, धोबी, आदि भी साथ होते थे. एक बार की बात है जब दातागंज में एक बरात ने डेरा डाला था. नाई, धोबी, मालिश करने वाले, पालिश करने वाले अपने-अपने काम में लगे थे. एक स्थान पर पेड़ के नीचे नाई ने हजामत की दुकान सजाई हुई थी और पेड़ पर वानर सेना अड्डा जमाये बैठी थी. एक बंदर बड़े ध्यान से नाई को उस्तरे से दाढ़ी बनाते देख रहा था. नाई किसी काम के लिये उठा कि इतने में उस चपल बंदर ने नीचे जाकर उस्तरे पर अधिकार कर लिया. जब बंदर पेड़ पर बैठा था तो उसकी नाक के ऊपर मक्खी भनभनाने लगी. बंदर ने अपने हाथ से मक्खी उड़ाने का प्रयत्न किया तो उसकी नाक में उस्तरे से कट गया और खून बहने लगा. अब बंदर ने उस्तरा तो नीचे फेंक दिया और फिर नाक पर हाथ लगाकर देखा. खून देखकर वह कूँ करता और एक डाल से कूदकर दूसरी पर चला जाता. बराती उसका तमाशा देखते रहे. बंदर को अपनी करनी का फल मिल गया.

बच्चों तुम्हें ज्ञात है कि बंदर बहुत नकलची होते हैं. एक बार एक बुड्ढा सौदागर एक झोले में टोपी लेकर बेचने आया. वह पेड़ के नीचे बैठकर धंधा करने लगा. ग्राहक आते, टोपी पहनकर देखते और पसंद आती तो खरीद कर सर पर लगा कर चल देते. बंदरों की टोली पेड़ पर बैठकर सब देख रही थी. ज़रा सी बुड्ढे की आँख बची कि एक बंदर टोपी वाला झोला लेकर चम्पत हो गया. सौदागर चकित था कि झोला कहाँ गायब हो गया. इसी बीच उसकी दृष्टि ऊपर पेड़ पर गई तो देखता क्या है कि कई बंदर सर पर टोपी लगाये बैठे हैं और कुछ टोपी को पकड़ कर लगाने का प्रयत्न कर रहे हैं. जो टोपी सर पर नहीं लगा पा रहे थे वे उसे फाड़ने की कोशिश कर रहे थे. बुड्ढा सौदागर यह देखकर रोने लगा. एक लड़का वहां खेल रहा था. वह हमेशा सबकी सहायता करता था. उसने कहा—‘’बाबा क्यों रोते हो? तुम्हारे पास एक टोपी हो तो मुझे दो. मैं अभी कुछ उपाय करता हूँ.’’ उसने टोपी बंदरों को दिखाते हुए सर पर लगाई. कुछ देर बाद कुछ बुदबुदाते हुए टोपी उतारकर नीचे फेंक दी. बंदरों ने उसे टोपी फेंकते हुए देखा तो खुद भी टोपी फेंकने लगे. इस बीच लड़के ने अपने पास रक्खे चने कुछ दूर पर फैला दिये. बंदरों का ध्यान बँट गया तो वे चने बीनकर खाने लगे. लड़के ने शीघ्रता से टोपियाँ बटोर कर सौदागर को दे दीं.

एक बार का एक मनोरंजक किस्सा मेरी भतीजी रानी ने सुनाया था. वह दातागंज में मेरी मम्मी के घर की छत पर सो रही थी. जब सूरज निकल आया तो उसका उठने का मन नहीं हुआ और वह मुँह पर चादर ढँक कर सो गई. इसी बीच एक बंदर का परिवार छत पर आ गया. बंदरोँ की आहट सुनकर रानी की रूह कांप उठी क्योँकि वहाँ के बंदर बहुत कटखने हैं. बंदर ने आकर शैतानी से रानी के मुख पर ढँकी चादर खोली और मुंह देखता रहा. रानी साँस साधे चुपचाप लेटी रही, तो बंदर ने चादर ढँक दी. अब क्या था वानर परिवार को एक खेल मिल गया. बारी-बारी एक बंदर आता और चादर उठा कर रानी का मुँह देखता और किलकारी मारता. यदि बंदरों की आवाज़ सुनकर मम्मी का सेवक दीनानाथ डंडा लेकर ऊपर न आता तो न जाने कब तक रानी की मुख दिखाई का खेल चलता रहता.

मैं अब तुम लोगों का परिचय अपनी मम्मी के पालतू कुत्ते टौमी से कराती हूँ. टौमी लगभग एक फुट लम्बा, छे इंच ऊँचा, भूरे-कत्थई रंग का बड़े-बड़े बालों वाला कुत्ता था. उसके कान लम्बे थे, आँखें गोल, बड़ी-बड़ी कजरारी थीं, जिनकी कोर गुलाबी थी. उसकी पूँछ पतली, लम्बी थी और उस पर बड़े-बड़े बाल थे. पैरों में बीस नाखून थे जो चलने पर छागल जैसे बजते थे. टौमी को भगवान ने कद तो छोटा दिया था पर हिम्मत और बहादुरी गज़ब की दी थी. वह अपने छोटे कद से बेखबर होकर बड़े से बड़े जीव पर भौँक कर झपट पड़ता था. भैँस, गाय, घोड़ा आदि तो टौमी के भौँकने की लाज रखकर पीछे हट जाते थे जिससे उसकी हिम्मत बढ़ गई थी. एक बार एक बहुत बड़ा झज्झू बंदर मम्मी के आँगन में रक्खे सब्ज़ी के टोकरे से प्रेम से सब्ज़ियों का भोग लगाने लगा. भला ऐसे में स्वामिभक्त टौमी यह कैसे बर्दाश्त करता. वह चेन में बंधे हुए ही जोर-जोर से भौँकने लगा और चेन तुड़ाने का प्रयत्न करने लगा. बंदर ने एक बार हिकारत से उसे देखा और अपनी पेट-पूजा करता रहा. टौमी ने किसी तरह गले से पट्टा निकाल लिया और ज़ोर-ज़ोर से भौंकते हुए बंदर की ओर दौड़ा. बंदर एक उपहास भरी दृष्टि टौमी पर डालकर सब्ज़ी खाने में व्यस्त रहा. टौमी अपने और बंदर के कद के अंतर की परवाह किये बिना बंदर पर झपट पड़ा. अब क्या था बंदर के क्रोध का पारावार न रहा. उसने एक हाथ से टौमी को पकड़ लिया और पहले तो दूसरे हाथ से उसके मुँह पर कई चपत लगाये और फिर अपने सामने गद्दे की तरह डालकर इतनी धुनाई की कि टौमी चिंचियाता रह गया. वह चुपचाप जाकर बेदम सा अपने बिस्तर पर पड़ गया. कुछ बंदर के बच्चे लौन में लगे गुलाचीन के पेड़ पर धमा-चौकड़ी कर रहे थे. वे एक दूसरे की पूँछ पकड़ कर लटकने का खेल खेल रहे थे, टौमी की आवाज़ सुनकर तमाशा देखने आ गये थे. अब बंदर के बच्चों को नई शैतानी सूझ गई. एक बच्चे ने आकर टौमी की पूँछ खींची और दौड़ कर छत पर चढ़ गया. जब तक टौमी सम्हलता तब तक दूसरा बच्चा नीचे आया और उसने टौमी का लम्बा कान खींचा और भाग लिया. टौमी न जाने कब तक बंदर के बच्चों के मनोरंजन का साधन बना रहता यदि रानी और मम्मी टौमी की चीखें सुनकर उसे बचाने न पहुँच जातीं.

बच्चो! इस घटना के बाद भी टौमी की बहादुरी और तेजी में कमी नहीं आई है. केवल इतना अंतर आया है कि बंदरों को देखकर टौमी शीघ्रता से एक बोरी के अंदर छिप जाते हैं और आँखें बंद करके तेजी से भौंकते हैं ताकि कोई न कोई आ जाये और बंदरों की खबर ले ले.


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