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वर्ष: 3, अंक 54, फरवरी(प्रथम) , 2019



पुरुष होती नारी


शुचि 'भवि'


वो घूंघट, वो पनघट, वो नटखट सी होती थी कभी, वो नारी होती थी कभी।अब तो बराबरी की मारी है, पुरुष वो कुछ ज़ियादा, कुछ कम वो नारी है।आश्चर्य मत करो दोस्त, एक नारी ही लिख रही है यह बात,आहत है बेहद, बदलते स्वरूप से वो समाज के।बदलाव नियम तो है सृष्टि का, कोई दो मत नहीं इसमें, मगर बदलाव के पैमाने भी तो हों कुछ, उसके फ़ायदे भी हों, उनसे कोई आहत भी न हो और वह बदलाव बेशक ही तुरंत अच्छा न लगे, मगर दूरगामी परिणाम उसके अच्छे ही हों।इस बदलाव की शुरुआत यदि याद करें हम तो तब हुई थी जब पुरूषों की भाँती नारी ने भी अपनी बुशर्ट के बटन खुले रखने की माँग की थी।अब काहे की माँग जी, बालों की लंबाई कपड़ों से ज़ियादा रहती है, ख़ुद को वो नारी कहती है।अच्छा है, बहुत अच्छा है, समकक्ष होना, बुद्धि में, निर्णय में, कार्यों में, जायदाद में, नाम में, उपनाम में, लिए-दिए गए सामान में, वाक़ई सराहनीय है ऐसा बदलाव जहाँ पुरुषों का आधिपत्य नहीं होता, महिलाओं की भी कुछ अहमियत होती है, उन्हें इस नाते दूर खड़ा नहीं किया जाता, कि वो महिला हैं, मान-सम्मान, पद, गरिमा, वेतन, पुरुस्कार सभी में समान रूप से भागीदार माना जाता है।

मगर ये तो कहो ओ बुद्धिजीवी मानव, जिस फ़र्क को ईश्वर ने बनाया है, उसे तुम कैसे मिटाओगे।क्या ईश्वर से तुम ख़ुद को बड़ा बनाओगे। देवतुल्य पूजनीय नारी ने आज समानता की होड़ में बुलन्दियों से ख़ुद को गर्त में मिला लिया है। ममता ,वात्सल्य, संवेदनशीलता, शालीनता,नम्रता, सौहार्दता, को उसने अपनी ताक़त नहीं बनिस्बत संकुचन समझना शुरू कर दिया है।फलस्वरूप नौ नस्लों में अवसाद, नशा, अक्खड़ता सभी कुछ बहुतायत में मिलने लगा है।

माता निर्माता भवति को झुठलाती वर्तमान की मॉडर्न नारी पुरुषों को कहती है कि तुम क्यों नहीं कर सकते निर्माण?वह दिन जल्द ही आएगा जब पुरुषों के लिए कानून बनेंगे संरक्षण के, अदालतों में भीड़ होगी पीड़ित पुरुषों की सुनवाई की, नारी प्रधान समाज के ज़ुल्मों के मुकदमों की भरमार होगी। समानता दिखाए तो ज़रा नारी अपनी ओलंपिक के खेलों में भी और दौड़ जाए पुरुषों के साथ ही, अंतिम से कुछ पहले ही स्थान पाकर ख़ुश रहना सीखना होगा उसे फिर। गधे के सिर से गायब हुए सींगों की तरह ही नारी का नाम सभी प्रकार के खेलों से गायब हो जाएगा।

ईश कृपा करें इस पुरुष बनाम नारी पर और इसे सद्बुद्धि दें समकक्षता की, ये पहचाने अपनी शारीरिक और मानसिक भिन्नता को और साथ चाहे पुरुष का, साथ दे पुरुष का, न कि समान खड़ी हो पुरुष के, पूरक होतें हैं पुरुष व नारी हमेशा से ही एक दूसरे के,प्रतिद्वन्दी नहीं होते कभी।पाश्चात्य की सोच ने गार्गी से सनी लियोनी तक का सफ़र भारतीयों को दिखाया है। संस्कारों की धरती पर नारी रूपी पुष्प भी ज़रूर खिलेगा बस आमूलचूक परिवर्तन की आवश्यकता है सोच में।नारी सब पर भारी थी और रहेगी भी, पुरुषों से कभी न हारी थी और न हारेगी।


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