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वर्ष: 3, अंक 54, फरवरी(प्रथम) , 2019



वक्त इतना बदल जायेगा भान नहीं था


डॉ ललिता यादव


          
कुछ ऐसा हो जायेगा अनुमान नहीं था
वक्त इतना बदल जायेगा भान नही था

मेरे बिना कटती नही थी जिनकी जिंदगी
वे ही किनारा कर लेंगे अनुमान नहीं था

वक्त ने मुझसे आँख मिचौली क्या कर ली
नकाब इस तरह खुल जायेगा अंदाज नहीं था

अच्छा ही हुआ जो वक्त ने सीखा दिया
वरना जीवन का ये सबक आसान नहीं था

बहुत कोशिश की मैंने भी रंग बदलने की
पर उनकी तरह बदलना आसान नहीं था

हमेशा ही कोशिश की रिश्ता दिल से निभाने की
कभी अपने फर्ज का गुमान नहीं था

हो जाती है गलतियाँ मुझसे भी
वरना लोग हमसे रूठे ये अरमान नहीं था

अपनत्व के हक जताने वालों से हार जाते हैं हम
वरना गुलामी करना कोई फरमान नहीं था

अनसुनी करके चलती रही अपनी राहों पर
घुट घुट कर मंजिल तक पहुँचना कोई काम नहीं था
                                    

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