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वर्ष: 3, अंक 54, फरवरी(प्रथम) , 2019



कायर मैं नहीं


राजीव कुमार


वो मरने से पहले कई बार मरा था। उसकी इच्छाशक्ति भी उसकी आत्मा को झकझोरने से भय खाती थी। सारी घटनाओं का वो मूक दर्शक ही था। वो प्रेम का पात्र कम और घृणा का पात्र ज्यादा था, मगर घृणा के लायक वो खुद को समझता भी क्यों? मोहल्ले में एक से एक गबरू जवान थे।

‘‘मनोहर काका को जब दूसरे मोहल्ले वाले आकर मार रहे थे तो तुम्हारा बेटा वहीं पर था कि नहीं, मीना चीची? रौशन ने तीखे तवर लेकर पलटवार किया। होता क्या था कि मोहल्ले में जो भी घटनाएं घटतीं तो लोग अपने लाडलों की उपस्थिति होते हुए भी रोशन से ही उम्मीद करते कि घटना को रोकने के लिए आगे बढ़े। अनाथ जो ठहरा, रोने वाला कौन बैठा था।

रोशन के कान जब कायर, बुजदिल जैसे शब्द सुनते एक जाते तो वो एक पैक लगाकर बिजली के खम्भे के नीचे से चिल्लाता, ‘ये नामर्दों का मोहल्ला है और कायरों का गांव, फिर क्यों हमको कायर और बुजदिल का देते हैं नाम?’’ फिर वहीं ढेर हो जाता। अचानक रोशन की हरकतों ने सबको चैंका दिया। उसकी दौड़ और कसरत की आदत पर तंज करते हुए सुमित्रा चाची ने पूछ ही लिया, ‘‘क्यों रे सेना में जाने का मन बना रहा है क्या?’’

रोशन ने शरमाते हुए कहा, ‘‘हां’’ में सिर हिलाया।

‘‘देश की रक्षा कर लेगा? मेरी कोमली की रक्षा तो नहीं कर पाया था उस दिन।’’ सुनते ही रोशन का चेहरा गुस्से से लाल हो गया और सुमित्रा चाची की पलकों के नीदे से दो-चार बूंद गिर गए।

जमा हो चुकी भीड़ ने ठहाका लगाया। इससे पहले कि रोशन व्यंग्य-बाण चलाता, अपशब्द कहता, वो स्थान निर्जन हो गया था।

सेना की ट्रेनिंग लेते समय भी रोशन के मित्र उसकी डांवाडोल होती इच्छाशक्ति पर संदेह करते थे, लेकिन रोशन ने साबित कर दिया खुद को।

आतंकवाद को बढ़ावा देने की नियत और देश को बुलंद करने के इरादे से सरहद पार कर रहे पचास शैतानों की मंडली को अकेले ही मार गिराया। रोशन का जिस्म पचास गोलियां सहने के बाद वहीं जवाब दे गया।

आज उसके मोहल्ले में बहादुरी के ही चर्चे थे। अब गांव का हर गबरू जवान खुद को कायर और बुजदिल महसूस कर रहा था। रोशन अपने नाम के अर्थ को सार्थक कर गया।

मरने के बाद वो सबके मन में हमेशा के लिए जिंदा हो गया।


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