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वर्ष: 3, अंक 54, फरवरी(प्रथम) , 2019



नियति


आशीष सहाय श्रीवास्तव


बर्फ रो रही है। वह आजाद होना चाहती है, पर द्रव रूप में परिवर्तित होकर नहीं। वह पानी की तरह विनम्रता से भयभीत है। वह उड़ना चाहती है, पर गैस बनकर नहीं। वह गुमनामी में गुम हो जाने को लेकर असमंजस में है। वह जो करे उसका पूरा श्रेय उसे मिलना चाहिए। अपनी पहचान के लिए वह अपने वर्तमान ठोस स्वरूप को कायम रखते हुए आगे बढ़ना चाहती है। इसी मुश्किल में घिरी बर्फ अपने आप में घुली जा रही है। हालात के आगे मजबूर, पिघलती जा रही है। बदलते मौसम से संघर्ष करते हुए....जैसे प्रश्न पूछ रही है, ‘‘क्या खुद को बदले बिना आजादी संभव है?’’


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