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वर्ष: 3, अंक 54, फरवरी(प्रथम) , 2019



नवीनता


शुचि 'भवि'


 
सुनो
नई थी न मैं बिल्कुल ही
जब साल पुराना था
और उतने ही नए थे न
तुम भी तो
हमारे विचार,हमारा अस्तिव
हमारा रिश्ता,हमारे एहसास
हमारी हक़ीक़त, हमारे ख़्वाब
हमारी बातें, हमारी मुलाकातें
हमारी लड़ाई,हमारा प्यार,
हमारा इकरार,हमारा तकरार
और इन सबके साथ 'हम'
सब पुरानों के बीच भी
कितने कितने नवीन थे न....

सुनो
आज सब कुछ नया है
तारीख़, दिन,महीना और
साल भी तो
मगर अब 'हम' पुराने हो गए
और साथ ही हो गयी पुरानी
हमारी बातें, और एहसास
शायद इसलिए ही
तुम नवीनता की ख़ोज में
कोलम्बस बने फिरते हो 
और मैं
पुराने बुत सी घूल सनी
करती हूँ इंतज़ार 
तुम्हारी थकन का,
इस उम्मीद के साथ
कि तुम जब 
नवीनता की तलाश से
थक कर लौटोगे
तो शायद
इस धूल की भी सफ़ाई होगी
और हम फिर से हो जायेंगे
'नवीन'
नये साल की तरह,,,,




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