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वर्ष: 3, अंक 54, फरवरी(प्रथम) , 2019



उम्मीदों से गिला, अच्छा था


शुचि 'भवि'


 
कुछ रातों की लंबाई
सदियों से लंबी होती है
कुछ नयनों की रुलाई
सागर सी गहरी होती है
कोई टूटता है इस कदर 
ज़िंदगी ही पराई होती है

प्रेम कुछ नहीं होता कहीं
लगाव ही होता सदा,
आदतों से, बातों से
मुलाक़ातों से, जज़्बात से
अधूरी चाहतों से,,
और लोग
प्रेम समझ लेते इसे
क्या हुआ
अगर तुमसे भी
हो गयी यही ग़लती??

रूह की पाकीज़गी
धराशाई होती है तब-
व्यवहारिकता 
सर चढ़ बोलती है जब,
बाहरी आवरण 
बेशक चाहत तुम्हारी रही-
रूह की सरलता और
पाकीज़गी ही
दौलत हमारी रही,,,,

जब से तेरे लायक़ नहीं हैं हम
सच है कि किसी भी अब
लायक़ नहीं हैं हम,
चुपचाप गुम हो जायेंगे ख़ला में
सच अपना पता भी न बतायेंगे,
ज़िंदगी की इस जिरह को भला
कैसे हम और आप ठुकरायेंगें?

काठ की गुड़िया आज भी है
ईश  की  लाडो आज  भी  है
सब  कुछ  ही दे आयी हो जो
उम्मीद की मारी आज भी  है

जो मिला जितना मिला,अच्छा था
जीवन  का  हर  सिला, अच्छा था
सपनों का एक्सीडेंट भयानक बहुत
उम्मीदों   से   गिला, अच्छा  था

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