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वर्ष: 3, अंक 54, फरवरी(प्रथम) , 2019



हवा चली


रामदयाल रोहज


 
कुछ गुनगुनाकर
पायल छनकाकर
कुंतल हिलाकर
थोङा सा शर्माकर
सङक सङक
गली गली
यहाँ वहाँ
हवा चली
शैल सहलाकर
पतंग बहलाकर
कुसुम हरषाकर
सुगंध बरसाकर
गगन गगन
जमीं जमीं
इधर उधर
हवा चली
ऊर्मियाँ नचाकर
बांसुरी सी बजाकर
कगार चमकाकर
हंसिनियाँ लजाकर
पुलिन पुलिन
नदी नदी
हिली मिलि
हवा चली
नमी से नहाकर
गुलाबजल लगाकर
फसल को झुलाकर
थकान को हटाकर
कुसुम कुसुम
फली फली
गले मिली
हवा चली

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