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वर्ष: 3, अंक 54, फरवरी(प्रथम) , 2019



ये किसान


राजेन्द्र कुमार शास्त्री `गुरु`


 
खेत जोतते हैं , फसल उगाते हैं, ये किसान,
मेहनत करते हैं, इसी कारण पड़ जाते हैं, इनके हाथो में निशान 
पशु पालते हैं, सूखी रोटी खाते है, ये किसान,
फिर भी इनके दिलों पर  पड़ जातें है, गमों के ये निशान 

जल्दी उठते हैं, देर से सोते हैं,
फिर भी  भूखे रह जाते हैं,
अपना काम करते हैं, किसी की नहीं सुनते हैं
फिर भी न जाने क्यों मर जाते हैं, ये किसान?

कभी इनके जीवन में भूख, तो कभी प्यास 
कभी दुःख तो,  तो कभी आस 
कभी जीवन, तो कभी अटक जाती है, हल्क में इनकी साँस 
बस बचती है, तो सिर्फ इनके खेतों में सूखी घास
 
खेत जोतते हैं, फसल उगाते हैं, ये किसान 
फिर भी न जाने क्यों भूखे पेट सोते हैं ये किसान 

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