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वर्ष: 3, अंक 54, फरवरी(प्रथम) , 2019



चटख़


डॉ. प्रणव भारती


 
तरतीबी के प्रयास में 
घूमते 
कुछ बेतरतीब प्रश्न 
हवा के झौंके से 
इधर-उधर डोलते 
टकराते हैं 
मौन की कगार से ----
कगार--
धूली-धूसरित है 
रिश्तों के चटककर 
टूटने के दंशों को 
समेटने के प्रयत्न में 
और भी असहज हो 
डगमगाती सी 
ढीली चाल से 
एक कोने में सहमी 
सुबकने को आतुर  
अचानक ,एक चुप्पी में 
सिमट जाती है 
सच कहूँ ---? 
ज़िंदगी के बेतरतीब होने के 
प्रश्न में सिकुड़े रिश्ते 
तख़्ती पर चॉक से लिखे गए 
श्लोक से 
मिटने को व्याकुल 
अपनी व्यथा का गायन 
करते लगते हैं  
रिश्तों के पर नहीं 
शिथिल पाँव उगने लगते हैं 
वे थिरकते हैं 
बहकते हैं 
कुनमुनाते हैं 
धाराशाई हो जाते हैं 
कतार में खड़े 
अपनी बारी आने की प्रतीक्षा में 
एक-एक करके 
मिटने लगते हैं 
तख़्ती हो जाती है ख़ाली 
एक नीरव सन्नाटे से भर उठती हैं 
दिशाएँ 
केवल एक गूँज को समेटती 
मौन की कगार 
तड़क उठती है -----||                                                                                                                                
 

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