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वर्ष: 3, अंक 54, फरवरी(प्रथम) , 2019



हम दो हमारा एक


पीयूष कुमार द्विवेदी 'पूतू'


 
आज छोड़ कर घर गया,
आवश्यक काम से शहर गया,
भीड़ इतनी थी,
लिख नहीं सकता कितनी थी,
नया-पुराना देखने को मिला,
धूल-धक्कड़ फाँकने को मिला,
मैं तो हैरान था,
बहुत परेशान था,
जनता का रेला,
सोच रहा था अकेला,
जनसंख्या वृद्धि निरंतर हो रही है,
हर जगह असुविधा हो रही है,
तभी एक बदलाव देखा,
पहले हम दो हमारे दो का नारा था,
लेकिन आज हर टेम्पो में लिखा था-
'हम दो हमारा एक।'
 

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