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वर्ष: 3, अंक 54, फरवरी(प्रथम) , 2019



आओ गाँव चलें


देवेन्द्र कुमार राय


             
चलो शुकून का समय बिताएँ।
वाहनों का तीखा धुंआ
कर्कश आभास, 
शांत नहीं एक भी पल
उद्विग्न मन
बेचैन जीवन को
चैन की तलाश, 
ऐसा ठाँव कहां पाएँ।
शांत, उन्मुक्त 
शोर शराबे से दूर, 
कोलाहल का लेश नहीं 
बचपन की पगडंडियाँ
जहां निहारे घूर-घूर, 
चलो अपने गाँव को आएँ।
वहां जहां पीपल का छांव
हो पुरवईया का जहां ठाँव, 
तालाबों की उर्मिल लहरों पर
जहां तैरती कागज की नाव, 
वहीं चलकर धुमि रचाएँ।
आमों की अमराई हो जहां 
बरगद के पालने झुलते हैं, 
जहां नीम के डोलते
जहां फसलों के बिछौने मिलते हैं, 
ऐसा अद्भुत आंचल को पाएँ।
चलो शुकून का समय बिताएँ। 
 

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