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वर्ष: 3, अंक 54, फरवरी(प्रथम) , 2019



विरासत


अनीता शर्मा


  
मेरी माँ ने मुझे अपना सब हुनर दे दिया।
उनमें भी सबसे ज्यादा;
अपनी पाककला का गुर दे दिया।

यूँ तो हर माँ गुणों की खान होती है।
पर किसी एक गुण से;
इंसान की अपनी पहचान होती है।

मेरी माँ की हर बात में कुछ ऐसा जादू था।
जिससे लगता था;
इस जहां के हर जर्रे पे बस मेरा ही काबू था।

मुझे छोड़ के वो इस जहां से चली गई है।
पता ही नहीं चलता;
क्या देके गई है; क्या लेके गई है।

विरासत में मिले गुण मैं अपनी बेटी को सिखा रही हूँ।
मेरी माँ की दिखाई हुई राह;
अब मैं उसका दिखा रही हूँ।

जब माँ बुलाती, न जाने के मैं नित नए बहाने बनाती।
आज मैं जाने को तैयार हूँ; 
पर कहीं से भी उसकी आवाज नहीं आती।

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