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वर्ष: 3, अंक 54, फरवरी(प्रथम) , 2019



पथराता बचपन


अनीता शर्मा


  
मजबूरी है या अभिशाप है.
गरीब होना सबसे बड़ा पाप है.
किसने बुना ये जंजाल है.
या प्रभु-माया का जाल है.
बचपन इसकी भेंट चढ़ा.
जीने-हित पत्थर तोड़ रहा.
पर तोड़ रहा कि जोड़ रहा.
सामने प्रश्न है ये विकट बड़ा.
ये समझना समझ से बाहर है.
ये इसकी कर है या करने वाला ईश्वर है.
इसे कुछ ना दिखाई दे.
बस पेट की गुड़-गुड़ सुनाई दे.
पत्थर तोड़ ये कण-कण जोड़ रहा.
रोटी मिलेगी आज,
ये सोच के पाहन फोड़ रहा. 

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