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वर्ष: 3, अंक 54, फरवरी(प्रथम) , 2019



इक दिन ऐसा आ जायेगा


पुष्पराज चसवाल


  
जिस दिन सम्भव हो जायेगा,   
पथिक तुम्हारा अपना रस्ता  
करके तुमको नित बाबस्ता,
आख़िर मंज़िल ले जायेगा।    
 
जब तुम श्रम की भाषा से 
बंध कर शुभ की आशा से, 
सत्य के दीप जलाओगे     
शुभ कर्मों पे बढ़ जाओगे,    
बचे रहोगे निराशा से। 
 
जिसने सच का गला दबाया 
वह आख़िर तक टिक न पाया, 
है इतिहास गवाही देता 
उसको गरिमा से भर देता, 
जिसने सच का दिया जलाया।

प्यार-मुहब्बत सबसे करना 
सोहबत की हुँकारें भरना, 
ख़ुशहाली को बाँटो ऐसे 
सब हर्षित हो जायें जैसे,  
सबका ध्यान बराबर रखना। 

अहंकार से रहना दूर 
कभी न मद में होना चूर,  
फिर देखो इक सुन्दर सपना 
कर लेना संसार ये अपना,
कभी न हो जाना मग़रूर।  

फिर कुदरत के रँग देखना 
दाता अपने  संग देखना, 
द्वारे खड़ी सफलता होगी  
जीवन में समरसता होगी, 
नव रँग में सब रँग देखना। 

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