Sahityasudha view
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
मुखपृष्ठ


साहित्यकारों की रचना स्थली

वर्ष: 3, अंक 54, फरवरी(प्रथम) , 2019



कौऐ की काँव-काँव


मुकेश कुमार ऋषि वर्मा


 
कौआ काला-काला |
खोल लिया इसने अक्ल का ताला ||
काँव-काँव का राग सुनाता |
पर कभी न धोखा खाता ||
कौआ काला-काला |
इसका बड़ा बोलबाला ||
छत की मुंडेर पर काँव-काँव बोले |
चुन्नू-मुन्नू के मन में मिश्री घोले ||
प्यारे-प्यारे मामा आयेंगे |
चना-रेबडीं लायेंगे ||
खुश हो मुन्नू ने रोटी छत पर उछाली |
कौए न झट उठा कर खाली ||
शाम हो गई पर मामा नहीं आये |
चुन्नू-मुन्नू ने मुंह फुलाये ||
मम्मी ने समझाया -
तुमको काँव-काँव का मतलब समझ न आया ||
कौआ भूख से काँव-काँव चिल्लाया |
नहीं कोई मामा के आने का संदेशा लाया ? 
 

कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें