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वर्ष: 2, अंक 30,  फरवरी(प्रथम), 2018



छूमंतर


राजीव कुमार


प्राची अपने ससुराल में सारे काम-धाम निपटाने के बाद कमर दर्द से परेशान हो, बिस्तर पर लेटे-लेटे बचपन की यादों में खो जाती है। प्राची अपनी माँ से कहती है, “माँ, कमर में दर्द है।”

माँ कहती है, “बस एक मिनट।” उनके हाथ लगते ही कमर दर्द छूमंतर गायब।

बुखार होने पर माँ परेशान होती। रात-भर जागकर ललाट के कपड़े बदलती और सुबह तक बुखार छूमंतर, गायब। अँधेरे में माँ के सीने से चिपकते ही भूत का डर छूमंतर, गायब। हर परेशानी छूमंतर।

ससुराल से जब भी मायके जाती तो प्राची दस दिन रुकती और माँ की सेवा करती।

प्राची अपनी माँ के कमर में झंडू बाम मलते हुए कहती, “माँ, जैसे आपके हाथ लगते ही मेरा दर्द, मेरी परेशानी छूमंतर हो जा जाती थी। आज आपका कमर दर्द भी छूमंतर हो जाएगा।”

माँ मुस्कराती और कहती, “अरे, तुम जब तक रहोगी, तभी तक मेरा दर्द छूमंतर होगा न, फिर उसके बाद दोनों बहू तो आफिस से आते ही अपना कमर दर्द और थकान लेकर बैठ जाती हैं।”

प्राची अपनी भाभियों से यह कहकर ससुराल लौट जाती है, “भाभी, अगर आपकी थकान और दर्द छूमंतर हो जाए तो माँ का भी कमर दर्द छूमंतर करने की कोशिश कीजिएगा।”

प्राची की दोनों भाभियां गुस्से में जल-भून जाती हैं।

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