Sahityasudha view
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
मुखपृष्ठ


साहित्यकारों की रचना स्थली

वर्ष: 2, अंक 30,  फरवरी(प्रथम), 2018



अपना घर


बसन्ती पंवार


इन पर भी क्लिक करके देखें



Redmi Y1 (Dark Grey, 32GB)
by Xiaomi
₹8,999.00

Moto G5s Plus
(Lunar Grey, 64GB) by Motorola
₹16,999.00
₹14,999.00

OnePlus 5T
(Midnight Black 6GB RAM + 64GB memory)
by OnePlus
₹32,999.00

संजय और सरिता अपने आठ वर्षीय बेटे दीपक के साथ गर्मी की छुट्टियों घूमने का आनन्द लेकर घर लौट आए । टैक्सी से उतर कर जैसे ही घर के दरवाजे पर पहुंचे , उनकी नजर नेम प्लेट पर पड़ी जिस पर अन्य किसी नाम को देखकर वह दंग रह गए ।

’’यह अपना ही तो घर है ना सरिता !’’

’हाँ , अपना ही है ।’’

‘‘फिर यह नेम प्लेट ?’’

‘’कुछ समझ में नहीं आ रहा है ।’’

उसी उहापोह में संजय ने कॉलबेल बजा दी । एक सज्जन ने दरवाजा खोला और प्रश्नसूचक नजरो से देखते हुए बोला-’’कहिए , किससे मिलना है ?’’

’’आप अजीब बात कर रहे हैं , यह घर हमारा है और आप हमी से ......... ?’’

‘‘ओह! तेा आप संजय बाबू हैं ।’’

’’हां , हां ..... और आप ?’’

’’जी , वो आपकी माँ ने यह घर हमें बेच दिया है । आप आइए , थके हारे हैं , चाय -नाश्ता कीजिए ।’’

‘‘अरे ! ये क्या मजाक कर रहै हैं ? हमारा सामान कहां है ?’’

’’आपका सामान मकान के दूसरे हिस्से के कमरे में रखा है । मांजी ने चाबी आपको देने के लिए हमारे पास रख छोड़ी है , लीजिए ।’’

’’और माँ कहां है ?’’

’’उन्होने एक संस्था खोल ली है ’ अपना घर ’ वह वहीं रहती हैं ।’’

सुनकर पति -पत्नी एक-दूसरे का मुंह देखने लगे । उन्हे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था । एक महीने के अन्दर ये क्या हो गया ? फिर वे घर के उस हिस्से में पहुंचे , जहां नौकर के लिए एक कमरा बना था । देखा , सभी सामान करीने से जमाया हुआ है । कमरे के अन्दर लेटबाथ तो थे ही, हक्के-बक्के से उन्हौंने फ्रेश होने का निश्चय किया । दीपक जो इतनी देर से सब-कुछ देख-सुन रहा था , उछल-कूद कर कहने लगा-’’अहा ...हो ...हो .... दादी ने ठीक किया .... अच्छा किया .... हा ...हा .... ।’’

इन पर भी क्लिक करके देखें



NEET ( National Eligibility Entrance Test )
MBBS & BDS Exam Books 2017 :
Practice Tests Guide 2017 with 0 Disc
Rs. 160

NEET - 12 Years'
Solved Papers (2006 - 2017)
Rs. 237

29 Years NEET/ AIPMT
Topic wise Solved Papers
PHYSICS (1988 - 2016) 11th Edition
Rs. 169

’’अरे ! तू ये क्या कह रहा है , बेटा ?’’

’’याद है ममा , जब पिछली बार दादी तीर्थ करने गई थी , तब आपने भी दादी का सारा सामान यहां फिंकवा दिया था । दादी ने तो फिर भी आपका सामान सही ढंग से रखा है । आपसे तो दादी ही अच्छी है ना ’’

’’चुप , फालतू की बकवास करता है ।बड़ों से जबान लड़ाता है , क्या स्कूल में यही सिखाया जाता है ? ’’

‘‘दादी भी तो बड़ी हैं , आप भी तो उनसे जबान लड़ाती हैं ।’’

‘‘तड़ाक !’’ सरिता एक चांटा जड़ दिया तो दीपक जोर-जोर से रोते हुए कहने लगा-

‘‘आप गंदी हो , मुझे दादी के पास छोड़ दो । मैं नहीं रहॅंूगा आपके पास ।’’

स्ंाजय ने पुचकार कर उसे चुप कराया । अपने घर के मालिक से माँ का पता पूछा और तीनों माँ से मिलने चल पड़े ।

नियत स्थान पर पहुंच कर उन्होंने देखा कि एक बड़ासा बोर्ड लगा है , जिस पर लिखा है-’अपना घर’ । वे गेट के अन्दर दाखिल हुए । वहां बड़ा सा बगीचा जिसमें नन्ही-नन्ही दूब निकलने को आतुर है । दीवार के पास रंग-बिरंगे खुशबुदार खूबसूरत फूलों के पौधे रखे हैं , जिनकी सुवास अन्दर आने वालों के दिलो-दिमाग को तरोताजा करने के लिए काफी है । संजय को याद आया कि उसकी माँ को बगीचा औूर फूल बहुत अच्छे लगते थे , लेकिन उसे पता नहीं क्यों ये सब बेकार काम लगता था । इसलिए वो माॅं की इस इच्छा का महत्व नहीं समझ सका ।

लाॅन को पार कर जब वे अन्दर के दरवाजे पर पहुंचे तो धूप-दीप की महक ने उनका स्वागत किया , जो गेट के पास ही बने राधा-कृश्ण के छोटे से मंदिर से आ रही थी । मन जैसे पवित्र हो गया । माॅं के लिए असीम प्यार उमड़ आया । साथ ही अपनी गलतियों का अहसास , जिसके लिए वो माॅं से माफी मंागने का भी हकदार नहीं ।

आगे एक कमरा जिस पर कार्यालय लिखा था । दरवाजे पर सुन्दर सा परदा झूल रहा था । उसे माॅं की आवाज सुनाई दी । शायद वो किसी महिला का हौंसला बढ़ा रही थी । उनकी हिम्मत नहीं हो रही थी कि परदा हटा कर अन्दर दाखिल हौं । नटखट दीपक ने धीरे से परदा हटाया- ’’अरे दादी ! पापा , ममा देखेा , दादी ये रही ।’’ कहता-कहता दीपक दौड़ कर दादी से लिपट गया ।

’’माॅं ।’’ संजय बोला ।

’’आ गया बेटा ! अरे बहु , तुम भी आई हो ?’’

’’दादी......दादी....., पहले आप मेरी बात सुनो , आप यहां क्यों आ गई ? क्या आप हमारे पास नहीं रहोगी ? आपने अच्छा किया , पापा-मम्मी का सामान कमरे में रखवा दिया , क्योंकि जब आप र्तीाि गई थी , मम्मी ने आपका सारा सामान कचरे की तरह उस कमरे में फेंक दिया था । फिर भी आपने इनका सामान सही रखा और.......मेरे खिलौने तो आपने कितने सुन्दर सजा कर रखे । दादी आप कितनी अच्छी हौ ।’’

दीपक की प्यारी , भोली-भाली बातों ने ममता माॅं को बहू-बेटे का व्यवहार याद दिला दिया । उसने सबकुछ सहकर भी यही कोशिश की िकवह अपने बच्चों के साथ रहै ।

उसे याद आया- उसके पति रेलवे में अच्छी पोस्ट पर थे । उनके माता-पिता का देहान्त बचपन में ही हो गया था । हम बड़े प्यार से रहते थे । संजय के जन्म ने हमारी खुशियों में चार चाॅंद लगा दिये । घर स्वर्ग से भी सुन्दर लगने लगा । संजय पढ़-लिख कर इंजिनियर बन गया । अब एक अरमान था कि एक सुन्दर सी बहू ले आएं जो हमारे साथ बेटी बनकर रहै । मगर यह सपना टूट गया । उसने अपनी पसंद की लड़की से शादी रचा ली । फिर भी मन को समझाया । सोचा-धूम-धाम से अपने रीति-रिवाज के अनुसार इनकी शादी कर बहु घर लाऐंगे । मगर संजय नहीं माना और सविता को घर ले आया । मैंने तो अपने मन को समझाकर उसे बहू और बेटी के रूप में स्वीकार कर लिया , मगर संजय के पिता लोगों के ताने सुन-सुन कर घायल हौ गये । और एक दिन हार्ट अटेक स ेचल बसे । होनी बड़ी बलवान है , मानकर मेने अपने आपको पूर्ण रूप से बहू-बेटे को समर्पित कर दिया ।

नियमानुसार मुझे पेंशन मिलती । पर बेटे की इतनी अच्छी कमाई , पेंशन जरूरत पड़ने पर उठा लूंगी , यह सोचकर हर माह रूपये नहीं निकालती । कुछ समय तो ठीक-ठाक चलता रहा । मगर दुनिया के दस्तूर कब बदलते हैं , बहू-बेटे का व्यवहार बदलने लगा । संजय घर में होता तो बहू उसे दिखाने के लिए काम करती और जैसे ही वो आॅफिस के लिए निकलता , तबीयत खराब का बहाना बना अपने कमरे में चली जाती । जैसे ही उसके आने का समय होता आकर मेरे काम में मीनमेख निकालती , मेरे हाथ से काम लेकर स्वयं करने लगती । संजय को लगता कि बेचारी सविता दिनभर काम में खटती रहती है और माॅं आराम फरमाती है ।

इन पर भी क्लिक करके देखें



Mammon Women's Handbag
And Sling Bag Combo(Hs-Combo-Tb,Multicolor)

बेटे ने बात करना बंद कर दिया । मन बेचैन हो तड़प उठा । उसके आने की प्रतीक्षा में भूखी रहती । उसकी आहट पर दौड़कर दरवाजा खोलती । मगर वह........वह.......मेरी अरेर बिना देखै चुपचाप अपने कमरे में चला जाता । मैं उससे पूछना चाहती-’बेटा , आखिर मेरा कसूर क्या है ? मगर कैसे ? ’ अपमान , मजबूरी और माॅं की ममता । मन खून के आॅंसू रोता । मगर उससे क्या ? मन की भावनाएॅं मन में ही दम तोड़ देती ।

फिर दीपक के आने की खुसी में मैं अपनी सारी तकलीफें भूल गई । सोचा-अब सब ठीक हौ जाएगा । छोटा अब दीपक मेरी गोद में होगा । सके जन्म ने ंतो मेरे शरीर में प्राण फंूक दिए । बिजली की सी फुर्ती से सभी काम किए । पेंशन के रूपयौं से उ बच्चे , बहू-बेटे के लिए खिलौने , कपड़े , गहने खरीदे । मगर बेटे ने लेना तो दूर , सामने तक नहीं देखा । बहू ने चुपचाप रख लिए । मन रो रहा था , समझ नहीं पा रही थी कि मेरा कसूर क्या है ? और तो और दीपक को बहू मेरी गोद से उठा ले जाती जैसे मुझे कोई छूत की बीमारी हौ । मैं तड़प उठती । फिर भी ढीठ की तरह बच्चे की तरफ खिंची चली जाती । दीपक चलना बोलना सीखा तो दा....दा....दी......कहता-कहता मेरे पास चला आता तो बहू उसे पीटती । मैं घुटती रहती । ये टीस......ये दर्द किसे बताती ?

चिन्ता व घुटन से मेरा तन-मन टूट रहा था । घर का काम करना भी कठिन हो गया । बीमार हुई तो रोटी-पानी को तरस गई । दीपक अब थोडऋा समझने लगा था , वौ चुपके से मुझे कुछ खाने को दे जाता । पिछले वर्श एक संघ तीर्थ यात्रा पर जा रहा था , थोडऋा मन बहल जाएगा , यह सोचकर मैं भी उनके साथ चल दी । दूर रहूंगी तो इनको भी कुछ अहसास होगा । रवाना हुइ्र तो बेटे-बहू ने मेरी तरफ देखा भी नहीं । दीपक ने कहा-’दादी , अपना ध्यान रखना , जल्दी आना ।’

मैं पूरी तरह टूट चुकी थी । कई बार कहा भी कि रूपये तो निकलवा लो , मुझे कौन से साथ लेकर मरना है , मगर कोई जवाब नहीं ।

तीर्थ से लौटी तो देखा , मेरा सामान नौकर वाले कमरे में रखा है , कूड़े-करकट की तरह । अब तो उनका मुंह देखने को भी तरस गई । दीपक चुपके-चुपके आता । वह अब सात वर्श का हौ गया था । समझदार भी था । स्कूल जाता । एक दिन उसने कहा-’’दादी , मेम ने हमें एक बहुत अच्छी मोरल स्टोरी सुनाई ’टिट फाॅर टेट ’, मैं आपको सुनाता हूं , आप भी वैसा ही करना ।’’

न जाने क्या हुआ कि उसकी उन बातों ने मेरा वजूद ही बदल दिया । अपने आप को संभाला । सोचा , मेरे जैसी स्थिति कहीं नकहीं हर घर में होती होगी । वृद्ध , बेसहारा , बेकाम के बुजुर्ग हर घर में है क्यों न उनके लिए ’अपना घर’ बनाया जाए । बस फिर क्या था , इधर-उधर से , जान पहचान वालों से मालूम करना सुरू कर दिया । जमीन लेकर बनाना आसान काम नहीं था । कहावत है ना कि ’जहां चाह वहां राह’ , संयोग से एक तैयार बड़ी जगह मिल गई , जिसमें छः कमरे , आॅफिस , बरामदा , बगीचा आदि सीाी थे । जमा पूंजी और पेंशन के रूपयेा से खरीदना संभव नहीं था अतः लोन के लिए कार्यवाही की । ईश्वर की दया से लोन भी मंजूर हो गया ।

गर्मी की छुट्टियां हौ गई थी । बेटा-बहू और दीपक घूमने जा रहै थे , तब दीपक घर की चाबी मुझे यह कह कर दे गया कि वे वापिस आए तब घर की साफ-सफाई , पानी आदि की व्यवस्था कर दे । ऐसा उसकी मम्मी ने कहा है ।

चाबी हाथ में आते ही एक विचार बिजली की तरह दिमाग में कौंधा और मैंने मन को कठोर कर तुरंत उसको मूर्त रूप दे दिया । सारा पैसा ’अपना घर’ में लगा दिया ताकि बुजुर्ग , बेसहारा यहां आराम से रह सकै ।

आज इतनें वर्शों बाद इसे माॅं की याद आई है ? इसके मुंह से ’माॅं’ निकला है , बहू ने पैर छुए हैं , क्योंकि........क्योंकि.........आज मेरा वजूद है । मेरे तन में जान है , इनके घर का कार्य कर सकती हूं । लेकिन जब मैं तिल-तिल मर रही थी , इन्हौंने मेरेे सामने देखा तक नहीं । लेकिन मेरे इस वजूद का सारा श्रेय मेरे लाडले दीपक को है , इस नन्ही सी जान ने मेरी ज़िदगी बदल दी । ’ओह ! मेरा लाडला प्यारा ।‘‘ दीपक दादी की गोद में झूम रहा था । दोनों की आॅंखों से आॅंसू बह रहै थे ।

‘‘दीपक , छोड़ो दादी को , और माॅं ये सब क्या है ? हमारे घर को आपने.......।‘‘

पहले अंदर आओ , आराम से बेठो ।‘‘ कहते हुए माॅं ने उस महिला को कुछ इशारा किया । आॅफिस के पास का दरवाजा खोलकर वह उन्हैं अंदर ले गई जहां एक बड़ा सा कमरा था । कमरे में माॅं और पिताजी की तस्वीर लगी थी और टेबल पर संजय , सरिता और दीपक की तसस्वीर रखी थी । शायद माॅं का यही कमरा था । हम सभी पलंग पर बैठ गए । दीपक दादी को कहकर बगीचे में खेलने चला गया ।

‘‘क्या बात है ? अब बोलो ।‘‘

‘‘आपने वो मकान बेच दिया ?‘‘

‘‘हाॅं ।‘‘

‘‘क्यों ?‘

‘मुझे यहां के लिए रूपयों की जरूरत थी ।‘‘

‘‘और हम , हम कहां रहेंगे ?‘‘

‘‘वो कमरा है ना ।‘‘

‘‘क्या........,हम वहां रहेंगे ?‘‘

‘‘क्यों ? क्या कमी है वहां ? सब सुविधाएं तो है ।‘‘

‘‘माॅं , कुछ तो मेरी इज्जत और पोस्ट का ख्याल किया होता ।‘‘

‘‘यही प्रश्न अगर मैं तुमसे पूछूं तो ?‘‘

‘‘‘‘क्येंा , मैने ऐसा क्या किया है ?‘‘

‘‘तुम्हारे जैसे इज्जतदार इंजिनियर की माॅं यदि एक कमरे में रह सकती है , तो तुम क्यों नहीं रह सकते ?‘‘

‘‘माॅं , हमें माफ कर दो । वो घर पिताजी की मेहनत से बना है , उसे वापस....।‘‘ ‘‘आज तुम्है पिताजी की मेहनत याद आ रही है ? जिन्दा माॅं से बात करना तो दूर , उसके सामने तक देखना तुम्हैं गवारा न था , क्या गुनाह था मेरा ? क्या मंागा था मैने तुम लोगों से ? जरा सा अपनापन ही तो , तुम....तुम तो....और फिर मैने कौन सी उनकी कमाई जुए में लुटाई है ? मैंने तो मेरे जैसों के लिए ही खर्च किए हैं । तुम्हारे जैसे बेटे-बहू जब मेरे जैसों को को ठुकराएंगे , तो वो कहाॅं जाएंगे ?‘‘

‘‘मगर माॅं....।‘‘

‘‘मगर क्या ? अगर तुम्हैं वहां रहने में शर्म आती है तो उसे भी बेच देती हूं , उसका पैसा भी यहां काम आएगा ।‘‘

‘‘और....हम....? इतनी कठोर मत बनो माॅं , माॅं तो माॅं ई होती है ।‘‘

‘‘नया मकान खरीद लो ।‘‘ वह अनसुना करते हुए बोली ।

ममता माॅं ने देखा संजय और सरिता उसकी गोद में लुढ़क फूट-फूट कर रो रहै हैं । उसको लगा उसका मन पिघल जाएगा । मन उनको सीने से लगाने के लिए तड़प उठा ।

उसने अपने मन को कठोर बनाने की कोशिश करते हुए कहा- मैं तुम्हारे लिए कुछ नहीं कर सकती , तुम जा सकते हो ।‘‘

उसे लगा अब वो रो पड़ेगी । वो ये क्या कर रही है अपने बच्चों के साथ । मन चीत्कार करने लगा । अपने आप को , अपने अंदर की माॅं को धिक्कारने लगा ।

‘‘मगर माॅं , दीपक आपके बगैर नहीं रहेगा ।‘‘

‘‘बच्चा है , धीरे-धीरे भूल जाएगा ।‘‘

‘‘नहीं दादी ! मैं नहीं भूलंगा ।‘‘ कहते हुए दीपक न जाने अचानक कहां से प्रकट हो गया । और बोला-

‘‘वैसे दादी , आपने बहुत सही किया ‘टिट फाॅर टेट‘ वाली मोरल स्टोरी मैं आपको सुनाता था ना ! मेरी एक बात मानोगी , दादी ?‘‘

‘‘बेटा , एक नहीं तेरी सो बातें मानूंगी ।‘‘ अब ममता माॅं अपने आॅंसू रोक नहीं पा रही थी ।

‘‘मम्मी-पापा , क्या आप सच में अपने किए पर दुःखी हैं ? सच बताना ।’’

‘‘सच बेटा , हमसे बहुत बड़ी गलती हुई ।’’

‘‘अगर मैं बड़ा होकर ऐसा ही आपके साथ करूं तो ?’’

’’नहीं बेटा , हम जी नहीं पाएंगे ।’’

‘‘फिर दादी.....दादी ने कैसे सहा होगा ?’’

’’हमें माफ कर दो बेटा !’’

‘‘नहीं....नहीं , हरगिज नहीं ।’’

‘‘नहीं दीपक बेटा , ऐसा नहीं कहते । अपने माॅं-बाप का दिल नहीं दुखाते ।’’

’’तो क्या दादी , आपनें इन्हैं माफ कर दिया ?’’

’’बेटा , माॅं कभी भी अपनें बच्चों को सजा नहीं दे सकती ।’’

’’मैं तो दादी , इन्हैं एक शर्त पर माफ कर सकता हूं ।’’

’’बेटा , हमें तुम्हारी सारी शर्तें मंजूर है ।’’ संजय सरिता दोनों एक साथ बोले ।

‘‘तो आपको यहां रह रहे सभी दादा-दादी की तन-मन से सेवा करनी होगी ।’’

’’हमें मंजूर है ।’’दोनो बोले ।

‘‘तो क्या दादी ,हम सभी आपके साथ ‘अपना घर’ में रह सकते हैं ? हम सभी यहां सबकी सेवा करेंगे ।’’

’’जुग-जुग जिओ मेरे बच्चे ! तुम्हारे जैसा बच्चा हर घर में हो ।’’ कहते हुए ममता माॅं ने अपना आंचल फैला दिया ।

बहर खूब वर्षा हुई थी । धरती माॅं का आंचल अपनी प्यास बुझा रहा था ।सूरज को निकला देख बादल के नन्हे-मुन्ने टुकड़े इधर-उधर दौड़ रहै थे । ’अपना घर’ के हाॅल में सभी एक-दूसरे को अपने हाथों से खिला रहै थे । ’अपना घर’ ममता की जीत में झूम रहा था ।


Rani Saahiba Printed
Art Bhagalpuri Silk Saree

Amayra blue floral printed long length
anarkali Cotton kurti for womens

Vaamsi Crepe Digital Printed Kurti
(VPK1265_Muti-Coloured_Free Size)

कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें