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वर्ष: 2, अंक 30, फरवरी(प्रथम), 2018



जीत ओढ़े घर गए हैं


अर्पित 'अदब'


 	
	
प्रेम में साक्षात मोहन
क्रोध में जैसे महेसर
जिनके आगे मृत्यु हारी
उनको कैसा कौन सा डर
वो की जिनकी वीरता से
दुश्मनों के सर गए हैं,
जीत ओढ़े घर गए हैं

कैसे कैसे युद्ध जीते
अनगिनत बिगड़े सुधारे
आज धरती के ये बेटे
बन गए नभ के सहारे
और लम्बी दूर राहों 
के ये पैदल हैं मुसाफिर
तीव्र वायु से समय को भी
ये पीछे कर गए हैं,
जीत ओढ़े घर गए हैं

द्वार को थामे खड़ी है
वो की जिसका मीत छूटा
माँ के जिसके आंसुओं संग
प्रार्थना का गीत फूटा
और रिश्ते भाई बहनें
राह बैठे ताकते हैं
आज सन्नाटे से लिपटी
आहटों से डर गए हैं,
जीत ओढ़े घर गए हैं
 
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