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वर्ष: 2, अंक 30, फरवरी(प्रथम), 2018



तेरी आँखों में....


नवीन मणि त्रिपाठी



तेरी आँखों में अभी तक  है अदावत  बाकी ।
है तेरे पास बहुत  आज भी  तुहमत  बाकी ।।

इस तरह  घूर  के देखो न मुझे  आप यहाँ ।
आपकी दिल पेअभी तक है हुकूमत बाकी।।

तोड़ सकता हूँ मुहब्बत  की ये दीवार मगर।
मेरे  किरदार में  शायद  है शराफत  बाकी ।।

ऐ मुहब्बत तेरे इल्जाम पे क्या क्या न सहा ।
बच गई कितनी अभी और फ़ज़ीहत बाकी ।।

मुस्कुरा कर वो गले मिल रहा है फिर मुझसे ।
कुछ तो होगी ही कोई खास ज़रूरत बाकी ।।

बात  होती  ही रही आपकी शब  भर उनसे ।
रह गई  कैसे  भला और  शिकायत  बाकी ।।

वो  मुलाकात  पे  बैठा  है  लगा कर  पहरा । 
तेरे दरबार  में कुछ  रह  गई  रिश्वत  बाकी ।।

कौन  कहता  है  वो  मासूम  बहुत  है यारों ।
उसकी फितरत में बला की हैशरारत बाकी।।

इश्क़ फरमाए भला कौन  हिमाकत  करके ।
आप रखते हैं कहाँ  गैर की  इज़्ज़त  बाकी।।

मेरे  साकी  तू  अभी और  चला  दौर  यहाँ ।
पास  मेरे  है अभी और  भी  दौलत बाकी ।।
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